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Hymn No. 1010 | Date: 25-Apr-1999
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संडे हो या मंडे, सुबह हो या शाम, हर पल जाये जीवन ढलता ।
संडे हो या मंडे, सुबह हो या शाम, हर पल जाये जीवन ढलता ।
भाग्यशाली तो तब ही बने हम सब, जब पाया मानुष तन ।
चरितार्थ तो तब होता है, जब तन में रहते हुये मन जा समाये पूर्ण में ।
कुछ भी किया हुआ व्यर्थ न जाता इस संसार में, गहन गति कर्मो की ।
जो चल न पाया अपने धर्म पे, व्यर्थ भया जन्म लेना उसका ।
हाथ पे हाथ धरके बैठो न, कुछ न कुछ करते रहो व्यवहार में ।
किये हुये को सोच-सोचके काहे मरना, मरना है तो जाओ प्रभु द्वारे ।
जो भी करना है करते जाओ मौज मनाते, मन को लगाना पल-पल प्रभु में ।
जीवन जीना सीख जाओगे, मौत भी कुछ बिगाड न पायेगी तुम्हारा ।
सब किया हुआ व्यर्थ होता है, मन को बांध जिसने पाया सब कुछ संसार में ।


- डॉ.संतोष सिंह