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Hymn No. 98 | Date: 10-May-1997
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लाख थाम ले दामन तू किसी का, अकेला आया है तू अकेला ही जायेगा ।
लाख थाम ले दामन तू किसी का, अकेला आया है तू अकेला ही जायेगा ।

हम सब की मंजिल एक है, पर रास्ते शुरू से अंत तक है जुदा – जुदा ।

खुदा के सिवाय कुछ हो नहीं सकता, पत्ता भी खडकता है मर्जी से उसकी ।

तू कुछ भी कर लें पार पा नहीं सकता, जब तक तू उसको पायेगा ना ।

तमन्नायें तो बहुत सी है, आज नहीं तो कल विदा लेना होगा इन सबसे ।

अधूरी यात्रा को पूरा करने के लिये जन्म लेना पड़ता है बार – बार ।

दरबार में तेरे हाजिर हो या ना हो, सजदा दिल के भीतर करना है अनेक बार ।

पार तो सबको जान है, तेरे करीब आने का यत्न क्यों ना करते है हम ।

बाधा तो मन डालता है, फिर मजहब का नाम क्यों है लेते ।

शुरूआत से जुड़ा जो था तुझसे, आज बिखरने पे ऐतराज ना है हमको ।


- डॉ.संतोष सिंह