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Hymn No. 1028 | Date: 01-May-1999
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मै नदी हूँ अगर, तू तो है सागर, दौड़ते चलते लांघी न जाने हमने कितनी वादियाँ ।
मै नदी हूँ अगर, तू तो है सागर, दौड़ते चलते लांघी न जाने हमने कितनी वादियाँ ।
ऊँचाई पे था तो देखा करता था तुझको, मिलन के लिये जैसे-जैसे बढ़ा तेरी और
तो अहसास हुआ तेरे-मेरे बीच की दूरियों का, कही रूक के आगे बढा कही सुख के भीतर-भीतर तेरी ओर चला ।
रोक न पाया कोई, रुकना आया नहीं स्वरूप बनता-बिगड़ता रहा तेरी ओर बढता गया ।
विश्वास था दिल को, मेरा अंत है तेरे अनंत में, कैसा भी हूँ तो तेरा ही स्वरूप
करते हुये सारे करम पहूँचना है मुझे मेरे धाम, सुबह हो या शाम चलते है रहना पल दर पल बढ़ते रहेगे और तेरी, हमारे मन के तरंगो पे होगी तस्वीर तेरी ।
रोके रोक सकता नहीं कोई छाप होगी गहरी इतनी, कोई चुरा नहीं पायेगा चाहे कितना भी चाहेगा ।
मिलन तय है हमारा आज नहीं तो कल, है हम सबको तेरे प्रेम का सहारा ।
मगरूरियत न है ये तो है तेरी कृपा, जो देता है परम विश्वास का प्रसाद ।


- डॉ.संतोष सिंह