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Hymn No. 1032 | Date: 03-May-1999
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बहुत पहले की बात है, एक शिष्य को प्यार था अपने गुरु से बहुत ।
बहुत पहले की बात है, एक शिष्य को प्यार था अपने गुरु से बहुत ।
रहता था हर पल अपने गुरु के करीब, बिन कुछ कहे करता था सब कुछ ।
गुरु का स्नेह अगाध था अपने शिष्यो पे, वे इक दूसरे का रखते थे खयाल बहुत
जीते जी मिसाल बन गये थे एक अनोखी परंपरा की, कुछ कर्मो का था खेल।
गुजरनी थी अभी अग्निपरीक्षा से, काल के आगे चली न है किसीकी ।
कहीं कुछ ऐसी चूक हो गयी, अभिशाप लगा जनमों जनम तक ।
बिछुड़ गये अपने प्यार से गुरु से, भूले हम भुला न वो आया हमारे पीछे-पीछे।
प्यार का गीत सुनाता था, मिटी हुयी स्मृतियों की याद दिलाता था ।
सहता था हमारे कर्मो को, काल के पंजे से छुडाने के लिये सर्वस्व अपना दाँव पे लगाता था ।
आँसू भर आते है प्यार देखके उसका, सर्वस्व जो वो पालन करता था अपने नियमो का ।


- डॉ.संतोष सिंह