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Hymn No. 1037 | Date: 05-May-1999
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कब तक चलता रहेगा खेल लुकाछुपी का तेरे-मेरे बीच ।
कब तक चलता रहेगा खेल लुकाछुपी का तेरे-मेरे बीच ।
छलता कौन किसे है मै कि तूं, कह नहीं पाऊं मेरे छलिये ।
छला है हमने तुझे अनेकों बार, वादे करके तोड़े कई-कई बार ।
स्वामी है तू हमारा, कृपा बरसायी कई बार, सजा देना तेरे हाथो में ।
होगी घोर पीड़ा तन को, विचलित न होने देंगे मन को ।
दिल में प्यार के सिवाय कुछ न होंगा, मुख में तेरा नाम रहे या न रहे ।
अच्छे के सिवाय कुछ न हो सकता है, गम और खुशी का है आना-जाना ।
एक बार जो रंग में रंग गये तेरे, छू नहीं सकता कोई और हमे ।
टूटता-छूटता है सब कुछ, रिश्ता जो कायम किया बदला नहीं जा सकता ।
कुछ भी हो जाये पकड़ा जो साथ तेरा, छूट न सकता है हाथ तेरा ।


- डॉ.संतोष सिंह