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Hymn No. 1047 | Date: 07-May-1999
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इच्छाओ की जंजीर को तोड़ना तू सिखा दे, मन को नाचना तू बता दे ।
इच्छाओ की जंजीर को तोड़ना तू सिखा दे, मन को नाचना तू बता दे ।
दिल की आवाज को सुनना तू सिखा दे, मोह को त्यागना तू बता दे ।
जीवन तेरे संग जुड़के जीना तू सिखा दे, फरियाद कभी न करना तू बता दे ।
पल-पल में पहुँचे कैसे करीब तेरे, मन को कैसे तेरी ओर मोडना तू बता दे ।
अंदाज हो निराला जो चुरा ले तेरा दिल, कहने करने तो कोई बांधा न हो हमे।
मस्त रहे हम अपने गीतों की फकीरी में, खाबो में आये बस तू हमारे ।
अपनी रौ में बढता जाऊं, पल-पल तेरे करीब होता जाऊं ।
बस एक ही भाव हो दिल में, मेरा तो कुछ नहीं तेरा हो सब कुछ ।
बयाँ करना अभी सीखा नहीं, पर मुलाकात पे मुलाकात करना चाहता हूँ तुझसे।
चुराया है जैसे तूने मेरे दिल को, चुरा ले वैसे तन-मन को मेरे ।


- डॉ.संतोष सिंह