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Hymn No. 1049 | Date: 08-May-1999
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एक ही कार्य करने को दिल है करता, चर्चा करता रहूं बस तेरी ।
एक ही कार्य करने को दिल है करता, चर्चा करता रहूं बस तेरी ।

शाश्वत तुझे छोड़के नश्वरता में मन क्यों लगाऊं, पर व्यवहार में न है चलता।

भेद कहीं हमारे मन में है, जो अलग मानता है तुझको इन सबसे ।

धर्म में न बंधा है तू, सर्व धर्म का शुरुआत और अंत है तुझमें ।

निर्गुण-निराकार रूप होके, विराजे तुझसे हर गुण और आकार ।

व्यवहार में कमी करते हुये रहना पडेगा लीन तुझमें ।

होने और न होने की परवाह न है करना बस करते है जाना ।

किसीसे से सरोकार तुझको नहीं, तो हम क्यों पैदा करे दिल में खाटास अपने ।

सब होगा जब रहेंगा प्यार तुझसे, ऐसा हो दिल में विश्वास ।

उंगली पकड के राह दिखायेगा तू, जब मन में न होगा दूजा कोई भाव ।


- डॉ.संतोष सिंह