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Hymn No. 1050 | Date: 08-May-1999
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ऐ खुदा तू क्यूं बार-बार है कहता हमको कुछ करने को ।
ऐ खुदा तू क्यूं बार-बार है कहता हमको कुछ करने को ।
तू है कुम्हार और हम है माटी के लौंदे आकार लेंगे हाथो से तेरे ।
क्या मिलाके कितना है गूँथना, ये सब तुझे ही तो है करना ।
कब चाक पे है चढ़ना, कितनी देर चलाके कौन सा रूप है देना ।
चाह के भी हम कर नहीं सकते, सब कुछ तुझें ही है करते जाना ।
कितनी देर कौन सी आग पे है पकाना, ये तूझे ही है आता ।
खुदा व्यर्थ है हमारा अहम, मैं मानके करुँ चाहे कितने करम ।
निति-नियता है तू हमारे जीवन का, कठपुतली है हम तेरे हाथों के ।
बनना-बिगड़ना सब तेरे हाथों में है, मंजूर करुँ या न करुँ है ये सच ।
कोई शोक नहीं, कोई सुख नहीं, मस्ती में रहूं हर पल, खुदा तेरी ।


- डॉ.संतोष सिंह