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Hymn No. 1053 | Date: 10-May-1999
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विस्तृत है तू गगन की तरह, विचरते है हम बनके पंछी (पंक्षी)।
विस्तृत है तू गगन की तरह, विचरते है हम बनके पंछी (पंक्षी)।
आनंद की बयार बहती रहती है, कभी ऊपर और कभी नीचे मस्ती में रहते हैं हम ।
बिखरा रहता है ज्ञान का उजाला, तम भरी रातों का न होता है नामोनिशान ।
बाहर और भीतर से रहते हैं सुख में, चारों ओर छाया रहता है प्यार ही प्यार ।
निश्चीत और निश्चिल होता है, (पंछीपन) पक्षीपन भुलाके बन जाते हैं गगन का हिस्सा ।
अनादि काल से शुरु किस्से का अंत होता है प्रभु तुझमें ।
अपने बीज रूप में जन्म दिया हमको, अपने सदृश बनने में मदद करता है तू सदा ।
करते हुये सब कुछ तू कर्तापन का भाव न आने देता है खुदमें ।
व्याख्या करना मुश्किल है तेरे बारे में, वो बात जिगर है जान ले कोई प्यार से ।
तू ही तो है इक, शहजादा, बनते बिगड़ते रहते है हम सब अनुरूप तेरे ।


- डॉ.संतोष सिंह