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Hymn No. 103 | Date: 05-Jul-1997
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घनघोर घटा छायीं बरसे बरखा रिमझिम – रिमझिम,
घनघोर घटा छायीं बरसे बरखा रिमझिम – रिमझिम,
मुझे हरी की याद आयी, मन मोरा झूम उठा ।
बिजली चमके चारों ओर नवजीवन का संचार हुआ ;
मानुष्य, पशु – पक्षी और पेड पौधे भी खिलखिला उठे ।
जिसने अमृत का पान कराया इस धरा को ;
आओ अर्पित कर दें अपने नम आँखों की दो बूँदें।
हम भूलें बार – बार उसको, पर वो न भूला हमको एक बार भी ;
तन के भेद मिटाके, सबको, अपने प्यार में भिगो डाला ।
चम - चम चमके बिजुरी, धुम – धडाक से बरसें बरखा रानी,
आओं भीगें इस बरखा में मन का मेल मिटा के लेकें हरि का नाम ।


- डॉ.संतोष सिंह