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Hymn No. 104 | Date: 14-Jul-1997
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ऐसी कैसी है तेरी खुदाई, सही नहीं जात है मुझसे तेरी जुदाई ।
ऐसी कैसी है तेरी खुदाई, सही नहीं जात है मुझसे तेरी जुदाई ।

शिकवा ना है मुझको तेरी किसी बात का, है तो बस तुझसे दूर रहने का।

जुर्रत मेरी इतनी भी ना है, कह सकूँ अपनी हर बात मैं तुझसे ।

यह सोचके हो जाता हूँ खुश मैं, मेरा मालिक तू है तेरा मैं खिदमतगार सही ।

मेरे जीवन की नैय्या का तू है खिवैया, पार लगाना है इस भवसागर से मुझको ।

आरजू मेरी बस तुझसे इतनी ही है, तेरे चरणों में टूटे मेरा दम ।

तन से जुदा होना है सबको एक दिन, मेरी आत्मा बन जाये तेरा एक अंग ।


- डॉ.संतोष सिंह