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Hymn No. 1059 | Date: 12-May-1999
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कुछ भी छिपा न है तुझसे, जानता है सब कुछ तू ।
कुछ भी छिपा न है तुझसे, जानता है सब कुछ तू ।
फिर भी क्यों कहना पड़ता है, तुझसे अपनी हर बात ।
ये कैसा नियम है, तेरी सहमति से घटता है संसार में सब ।
फिर बताने की परंपरा क्यों निभानी है पडती ।
समझ नहीं पाता ये कौन सा खेल खेलता है तू हम सबके संग ।
क्या तुझपे कुछ भी फर्क न है पड़ता, हमारे गम और खुशी को देखके ।
जान नहीं पाता इसके पीछे क्या है तेरी मंशा ।
जीवन चक्र ऐसा तूने क्यों गढ़ा, बेबस हो जाते है उसके आगे ।
मै निर्बल सबल बनना नहीं चाहता, ज्ञान और प्रेम में फँसना नहीं चाहता ।
ढल जाना चाहूँ अनुरूप तेरे, निःशंक होके तेरा बनू जो तू कहे वही करुँ ।


- डॉ.संतोष सिंह