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Hymn No. 1066 | Date: 14-May-1999
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सीखा नहीं हूँ अपने किये का, किसी और के सर पे मढना ।
सीखा नहीं हूँ अपने किये का, किसी और के सर पे मढना ।
न ही दोष-देता हूँ ग्रह-नक्षत्रो का, जो खेल-खेलते है संग हमारे ।
प्रारब्ध में क्या लिखा है मैं नहीं जानता, हाँ मौका दिया है आज हमने उसे ।
क्रिया क्या कर लेगी हमारी, जैसी होगी करनी वैसी भरनी-भरनी पड़ेगी ।
इस लेखा-जोखा में कहाँ है, जो दाग लगा दूँ तेरे दामन पे ।
अपने किये का भान्डा न है फोड़ना चाहता हूँ किसी और के सर पे ।
पर ये भी उतना सच है, इस जगत में हम है बस तेरी छाया ।
स्वतंत्र कितना भी रह लें, पर हमेशा बंधे है तेरे विधिविधानों से ।
बचने के लिये न हूँ कुछ कहता, न ही जुबाँ लड़ाने की जुर्रत है मेरी ।
जो कुछ भी कहाँ हमने तुझसे, दिल में ये बातें डाली है तूने जरूर ।


- डॉ.संतोष सिंह