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Hymn No. 1071 | Date: 15-May-1999
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छिप नहीं सकता तेरी नजरों से कुछ, छिपाने को हम भी तैयार नहीं ।
छिप नहीं सकता तेरी नजरों से कुछ, छिपाने को हम भी तैयार नहीं ।
जो भी हूँ जैसा भी हूँ हकदार हूँ, तेरे चरणो में रहने का ।
होगा दागदार मन मेरा, इसपे सवालिया निशान न खड़ा करना प्यार पे मेरे ।
अतृप्त हैं अभी कई इच्छायें, उससे ज्यादा दिल को है तुझसे प्यार ।
निर्बल न हूँ मैं इतना, अधीनता स्वीकार कर लूं वासनाओं की ।
न कुछ स्वीकारना है न कुछ ठुकराना, मुझे ढलना है मर्जी के अनरूप तेरे ।
मचा रहता है मै इतना, आधीनता स्वाकार कर लू वासनाओ को ।
न कुछ स्वीकारना है न कुछ ठुकराना, मुझे ढलना है मर्जी के अनुरूप तेरे ।
मचा रहता है कोहराम हमारे भीतर, विषय वासनाओ के संसार को लेके ।
आती-जाती है हमारे मन के भीतर ज्वार-भाटाओ की तरह तरंगे ।
रोक नहीं सकता उन्हे, न ही पस्त होने वाला हूँ, प्रभु जो करना होगा तुझे ही।
पूकारता इतनी बार भान निकल जायेगा सभी का, होगा हर पल दिल के हमारे करीब तू ।
- डॉ.संतोष सिंह
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निर्बल है हमारा मन तो भी तेरे वजूद को कभी टाल सकता नहीं ।
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