VIEW HYMN

Hymn No. 1075 | Date: 16-May-1999
Text Size
क्या नहीं सीखा है तुझसे, सीखते रहेंगे हम सदा सब कुछ तुझसे ।
क्या नहीं सीखा है तुझसे, सीखते रहेंगे हम सदा सब कुछ तुझसे ।
मिथ्या जगत है कर्मो की जेल, मैं बनके जो किया आजन्म बंधे बंधन में
उसके तोड़ने की इच्छा न है, न है हममें अटूट ताकत इतनी ।
बंधे या खुले रहें, फर्क न पड़े हमारे प्यार की मस्ती में ।
मांग किसी विशेष की न रखता हूँ, प्यार दिल ही दिल में करता हूँ ।
नहीं चाहिये कुछ मुझे, मिल जाये अगर शाश्वत प्यार तेरा ।
ढूंढता है मुझमें तेरे वास्ते, न कि रुढ़ियत है परंपराओ को लेके ।
जो भी हुआ या होगा, तेरे चाहने के सिवाय कुछ न होगा ।
हम मस्त हो जायें तेरे प्यार में इतना, होने न होने का बोध न हो तन-मन को ।
कभी अच्छे के सिवाय हुआ कुछ न है, बुरा तो मन का है विकार ।


- डॉ.संतोष सिंह