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Hymn No. 1089 | Date: 21-May-1999
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ऐ.. मेरी शुरुआत ! कर दे तू मेरा अंत, हो जाऊँगा लुप्त जहाँ से कि थी शुरुआत
ऐ.. मेरी शुरुआत ! कर दे तू मेरा अंत, हो जाऊँगा लुप्त जहाँ से कि थी शुरुआत
बुलबुले का कोई मतलब नहीं होता, सागर के मौजों पर उभरता है ओर अंत वही होता है ।
एक पल की है ये जिंदगी, जिसका कोई सार नहीं, न ही है ये बेकार ।
कुछ भी कर ले, मत तोड़ो अपनी मस्ती को, आहत कर नहीं पाएगा दुनिया का कोई भाव ।
सागर की मस्ती देखो, गर आए कितने आंधी और तूफाँ भीतर से रहता शांत सदा ।
आ-आकर मिलते रहे न जाने कैसे-कैसे लोग, फिर भी ना छोड़ा कभी अपने मूल स्वरूप को
जीवन जीना है तो उसकी तरह जियो, निर्बाध गति से अपनी सरहद में मौज़ करो ।
न मन में कोई आशंका हो नुकसान ओर नफे की, जो भी होगा उसके बाद
मंगलमय होगा ।
मुश्किल जरूर है पर होना तय है इसका, जिसने किया प्रयास उसका दिया साथ खुदा ने ।
करना पड़ेगा हर एक को ये प्रयास, बिना किए कोई रह नहीं सकता इस जहाँ में।


- डॉ.संतोष सिंह