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Hymn No. 1095 | Date: 24-May-1999
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गुरु मेरा परमात्मा, चमके दिलों में हमारे बनकर आत्मा ।
गुरु मेरा परमात्मा, चमके दिलों में हमारे बनकर आत्मा ।
चमड़े के थैले को समझा मैं, ढूँढ़ने लगा तो कही नहीं पाया ।
है आँखों पर हमारे माया की पट्टी, देखने नहीं देती अपने करीबी को ।
जब मन लगता है पिता के चरणों में, तो समझ में आता ।
तब किसी और का साथ नही सुहाता, जब दिल में वह समा जाता ।
पलभर बगैर उसके रहा नहीं जाता, ढुँढता है हाले-दिल कहने को ।
बिना कहे रहा नहीं जाता, पल-पल पास उसे अपने पाता ।
किया धरा कुछ ना है हमारा, ये तो बानगी प्यार की उसकी ।
जो मैं बनकर न कर पाया, प्यार उसका कर दिखाता ।
मैं का खेल है मिट जाता, प्यार-प्यार में उसका ही बन जाता ।


- डॉ.संतोष सिंह