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Hymn No. 1102 | Date: 25-May-1999
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अंत है सबका, अंत नहीं मोहब्बत का, जान लो डूबा रहता हैं इसमें खुदा ।
अंत है सबका, अंत नहीं मोहब्बत का, जान लो डूबा रहता हैं इसमें खुदा ।
जिसने की इक बार मोहब्बत, हो नहीं सकता जुदा फिर वह मोहब्बत से ।
इतनी कशीश है इस में, बेबस बना के छोड़ता है दिल को, मोहब्बत के वास्ते ।
बचा न है कोई इससे, जो इक बार को हुई मोहब्बत, तो करते चला गया ।
ये कब, कैसे हो जाता हैं किसीसे, करनवालों के लिए भी कहना हैं मुश्किल ।
राहें मोहब्बत में परवाह न करते है अंजाम की, वे तो तैयार रहते है फनाह होने के वास्ते ।
जब बंद होते है सारे रास्ते, तो तोड़ देते है हर दीवार मोहब्बत करनेवाले ।
हर हालात में खोये रहते है, मोहब्बत में अपनी, रहती नहीं चाह उसके सिवाय किसीकी ।
बयाँ करना है मुश्किल, हाले मोहब्बत का, कर के देखना हैं ही सही ।
भरोसा न है मोहब्बत का, राह के किस दौर में हो जाए दूर से पता नहीं ।


- डॉ.संतोष सिंह