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Hymn No. 1112 | Date: 28-May-1999
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कितना करीब है तू मेरे, करता है तू सब कुछ मुताबिक मेरे ।
कितना करीब है तू मेरे, करता है तू सब कुछ मुताबिक मेरे ।
कृपा करके मान ले एक और बात मेरी, जो हो गई है मेरे वास्ते जरूरी ।
फर्क ना पड़ता है तुझको कुछ, पर फर्क पड़ जाएगा प्रभु मेरे दिल को ।
माना की काबील न हुआ हूँ प्यार के तेरे, कैसे तोडूँ इस घेरे को ।
कचोटती है मुझको मेरी अंतरात्मा, सोचता हूँ तेरे पास रहकर क्यूं न हुआ तेरा
मैं जीतना न चाहता हूँ तुझसे, हाँ पर हार जाना चाहता हूँ खुद को हाथों तेरे ।
मेरे किए हुए पर न कर खड़ा सवाल तू, हर कमजोर करता है ऐसा ।
तू है तीनों लोको का मालिक, पड़ता है यहाँ निभाना इस लोक के कानून को ।
विरला हो कोई, होता है ऐसा, जो ललकारता है यहाँ के रस्मों-रीवाजों को ।
उसपर भी होती हैं तेरी कृपा, तो तोड़कर इन नियमों को मिलता है तुझसे ।
- डॉ.संतोष सिंह
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छीन ले तू हमसे सब कुछ, रह न जाए पास हमारे कुछ ।
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झाँक लेने दे तू मुझे तेरी नजरों में, खो जाना चाहता हूँ अतूल गहराइयो में ।
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