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Hymn No. 1114 | Date: 29-May-1999
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सच-सच आज तू ये बता दे, क्या है इस संसार में मेरा ।
सच-सच आज तू ये बता दे, क्या है इस संसार में मेरा ।
दिखावा हैं सब कुछ, हक नहीं रखता मैं किसी पर अपना ।
तन-मन हो या जीवन में कुछ भी, पाया हैं तुझसे सब कुछ ही ।
किसी पर न है वश मेरा, सब कुछ बँधा हुआ है तेरे नियमों से ।
फिर बाँधता है तू क्यों मुझे इस तन-मन के संसार में ।
अगर ये जगत है सपनों का व्यापार, तो तू क्यों देता है सजा सचमुच की ।
मिटाने और उठानेवाला तू है, तू ही तो रचता-बसता है संसार में ।
फिर क्यों भेद पनपता है हमारे दिलो में, अचूक तू है तो हमें बना दे ।
दोषारोपण न हूँ मैं करता, अज्ञानी के दिल में उठे है कुछ सवाल ।
जिनका तू देकर जवाब, बना दे मुझे निशंक तेरे प्यार के प्रति ।


- डॉ.संतोष सिंह