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Hymn No. 1133 | Date: 05-Jun-1999
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निकले है मंजिल की ओर, बिन पहुँचे मानेंगे नहीं ।
निकले है मंजिल की ओर, बिन पहुँचे मानेंगे नहीं ।
रूकना पड़ेगा कई बार, चल पड़ेगे हम हर बार ।
हाथो में हाथ है जब तक सदगुरु का, तय हो चुकी राह मेरी ।
मन के सारे वहमो का अंत हो गया, जो बरसी कृपा उसकी ।
रोम-रोम तर उठता है आनंद में, विचार करके उसके प्यार का ।
आँखों से बरसाए उमंगो की बूँदे, खिल उठता है दिल हमारा ।
हर अनहोनी पर भारी है प्यार उसका, जो निश्चित होकर जीना सिखाता ।
मानो या न मानो बयाँ करना है मुश्किल, उसके प्यार भरे अंदाज का ।
मौत और जीवन का भेद मिट जाता, जो इक बार उससे गूँथ जाता ।
जन्म ले रहा है संसार हर पल मिटकर, उसके सपनों के संसार में ।


- डॉ.संतोष सिंह