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Hymn No. 111 | Date: 26-Sep-1997
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बरसे बादल साल के चार महीने ;
बरसे बादल साल के चार महीने ;
इंतजार में तरसे धरा आठ महीने ।
मिलने पे सारे गिले –शिकवे छोड़ के ;
अंग – अंग धरा का खुशी से लहलहा उठे ।
सूखा झेलें, झेलें बिजली की ललकार ;
वक्त के थपेडा के संग काया बनाले ।
फिर भी करे इंतजार, मिलने को रहे बेकरार ;
सहें सब कुछ अपने ऊपर देती नवजीवनदान ।
मानव तेरे तन की सहीं कहानी है ;
दुश्मन – दोस्त भूल के, सुख दुःख की चिंता छोडके,
करना होगा सर्वस्व दान बिन किसी भेद के
तू इस धरा से ही जन्मा है,
सब छोड इस धरा में ही मिल जाना है ।


- डॉ.संतोष सिंह