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Hymn No. 1143 | Date: 10-Jun-1999
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एक दिन मैंने पूछा मेरे यार से, तरसाना तुमने किससे सीखा ।
एक दिन मैंने पूछा मेरे यार से, तरसाना तुमने किससे सीखा ।
प्यार का इक घूँट पिलाके, दिलों को तड़पाना तुमने किससे सीखा ।
बाँधता क्यों नही तू किसी एक से, हजारों दिलों को छलता है तू कब से ।
तेरी मुस्कान बयाँ कर जाती है चाल को तेरे, लुटते रहे है हम जैसे मस्ताने ।
चारों ओर जलवा बिखरे प्यार का तू अपने, कुर्बान हुए न जाने कितने परवाने ।
हाल उनका बुरा करके, नाम दे देता है तू दीवानगी का ।
कसम से तेरे इस भोलेपन पर कुर्बान हो जाने का मन करता है ।
हाय रे तू इतना न डूब अपनी मस्ती में, कि तुझे भान नहीं रहे किसीके प्यार का ।
यार मेरे तू इतना संगदिल मत बन, जोड ले अपनेआप को हमारे दिलों से ।
क्या फर्क पड़ता है जो इक बूँद को मिल जाएगा प्यार का महासागर ।


- डॉ.संतोष सिंह