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Hymn No. 1150 | Date: 12-Jun-1999
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औंकात नहीं मेरी कोई, जो चूम सकूँ तेरे कदमों को ।
औंकात नहीं मेरी कोई, जो चूम सकूँ तेरे कदमों को ।
मालिक कृपा है तेरी हमपर इतनी, जो प्यार करते है तुझसे ।
लायक तो नहीं तेरे नजदीक आने के, तेरी लय से चले आते है ।
नजरें इनायत है तेरी हमपर, जो कहने का मौका देता है सब कुछ ।
अंदाज है तेरा निराला, हमारे भीतर के भावों को तू बाहर लाना ।
संयम का पाठ पढाते हुए, इक-इक करके पूरी करता है हमारी इच्छाओं को ।
जीना सीखाता है तू मुक्त होकर, कर्म करना और निर्लिप्त रहना ।
दंग हो जाता हूँ, जो तेरे इक रूप में हजारो रूप समाते देखता हूँ ।
आगे क्या होगा ना है कुछ पता, ये क्षुद्र तर गया पास आकर तेरे ।
ज्यादा ना हूँ चाहता कुछ, बरकरार रखना तू प्यार हमारे दिलों में ।


- डॉ.संतोष सिंह