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Hymn No. 1152 | Date: 13-Jun-1999
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कुदरत का प्यार देखो, जो बरसे हर साल बनकर बरसात ।
कुदरत का प्यार देखो, जो बरसे हर साल बनकर बरसात ।
करिश्मा नही तो क्या है, जो हर भेद भूलाकर बरसता सबपर एक-सा।
छोड़े ना वह किसी को भिगो देता है अपने प्यार में सभी को ।
हर दिल मचल उठता है, अपनी सीमाओ को तोडकर मिलन के वास्ते ।
करता है दिल में उमगों की बरसात, जन्म देता है अनंत सम्भावनाओं को ।
गूंजती चारों ओर प्यार की आवाज, बनकर बादलों की गडगडाहट ।
हर लेती है हमी से हमारा अहम, भीगाकर बाहर और भीतर से ।
भाप बनकर उड़ जाते है गम, शीतल बयारों से फूटता है प्यार उसका ।
तरस हमारी मिटता है, अमृतमय प्यार की बरसात है ।
कुम्हलाया हुआ जीवन खिल उठता है, पाकर निर्मल प्यार उसका ।


- डॉ.संतोष सिंह