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Hymn No. 113 | Date: 06-Nov-1997
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मेरे प्रिय काका के, जन्मदिवस पर यह पक्तियाँ अर्पित करता हूँ
मेरे प्रिय काका के, जन्मदिवस पर यह पक्तियाँ अर्पित करता हूँ
उनके ही आशीर्वाद से मैंने लिखा
कुछ पाने के लायक मैं तो नहीं,
जो कुछ भी पाया मैंने तेरी ही कृपा से ।
गम की दरिया में डूबा तथा कंठ तक
जीवन का संचार हुआ तेरी शरण में आकर ।
तिल – तिल घुटता रहता था मैं अपने में ;
पल – पल खुश रहता हूँ तेरे ख्यालों के संग ।
क्रूर कर्म थे मेरे फिर भी तू ने ना द्वेष किया ;
वो सब कुछ देना चाहा जिसके हम पात्र ना थे।
जिस जहाँ के लोगों से घृणा करता था मैं ;
उस जहाँ को प्यार करना मैंने तुझसे सीखा ।
अब इस तन – मन की परवाह ना है मुझको ;
आखरी श्वास तक रहना है चरणों में तेरे ।


- डॉ.संतोष सिंह