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Hymn No. 1165 | Date: 19-Jun-1999
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प्यार का नया अवतार है काका, प्यार का नया नाम है काका ।
प्यार का नया अवतार है काका, प्यार का नया नाम है काका ।
करुँ मैं जितना बखान, अधूरा है हर शब्द बताने को उसकी गाथा ।
शब्दों की सीमा में कैसे बाँधा जा सकता है परम को ।
वह तो प्यार का स्वरूप है प्रकटाया है उस में से आनंद ।
सरोकार नहीं है उसे किसी से, हर एक को स्वीकारता है पास अपने ।
मस्त है वह प्यार की मस्ती में, साकार होता है मस्तानों के सामने ।
जो आया उसके करीब, हो गया आनंदमय, भुलकर सारे विषय को ।
हरना है उसका काम, जिसने सौंपा अपनेआप, को हो गया दीवाना ।
तरसाया ना कभी अपने चाहनेवालों को, चाहत के अनुरूप स्वांग रचाया ।
निरंकारी रहकर रहता है मस्त अपने फकीरी में, सीखाते रहना वैसा ही हम सबको ।


- डॉ.संतोष सिंह