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Hymn No. 1170 | Date: 20-Jun-1999
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बीत रहा है सब कुछ, बीतने दे तेरे अनुरूप हम सबको ।
बीत रहा है सब कुछ, बीतने दे तेरे अनुरूप हम सबको ।
अपना होने का ना है कुछ गुमाँ, जो कुछ हो तेरे मुताबिक ।
किताबों से कितना ज्ञान पाएँगे प्रेम, यह तो जन्मता है तेरा साथ पाकर ।
रघुवीर नंदन, तेरी मुस्कान में छिपा है, गूढ़ से गूढ़ तत्वों का रहस्य ।
हे द्वारकाधीश ! मजबूर कर देती है तेरी मुरली की तान हमें झूमने को ।
तेरे करीब पहुँचते ही, समय पलक झपकते ही गुजर जाता है ।
बावरा बन चुका हूँ तेरे अकिंचन रूप का, जो बस गई दिल में मेरे ।
हवाले कर चुका हूँ अपनेआप को तेरे, जिस हाल में तू रख दे ।
बन जाऊँ तेरे प्रार्थना का इक शब्द, बिसरकर इस तन-मन को ।


- डॉ.संतोष सिंह