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Hymn No. 115 | Date: 12-Nov-1997
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जी भरके शरारत करने को दिल करता है तेरे साथ,
जी भरके शरारत करने को दिल करता है तेरे साथ,
आँसू निकल आयें तो चाहूँ रहे तू सामने नजरों के मेरे ।
अधरो पे हो हँसी तो रहूँ बैठा तेरे ही चरणों में,
रोने का अहसास हो तो रख सकूँ तेरे कंधों पे सर मैं ।
इस भीड़ में अकेला होने को जी चाहता है तेरे संग ;
सबके संग तेरी ही बातें करने को जी चाहता है ।
इकरार कर या इन्कार मुझे तो करना है तुझसे प्यार,
हर पल तू है मेरे संग इसका अहसास रहता है मुझको।


- डॉ.संतोष सिंह