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Hymn No. 1180 | Date: 25-Jun-1999
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ख्वाबों की दुनिया से निकलकर, साक्षात्कार कब होगा हम को तेरा ।
ख्वाबों की दुनिया से निकलकर, साक्षात्कार कब होगा हम को तेरा ।
जहन में छवि अंकित है तेरी, दीदार किया बंद नजरों के दर्पण से ।
अब दिल में जगी है एक इच्छा, तेरे सम्मुख बैठकर रूप-रस पीना चाहूं ।
दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है जीना मेरा, मिलन चाहता हूँ अब तुझसे।
दीदार हुआ कई बार तेरा, न जाने दिल क्यों तरसता है, अब भी तेरे लिए ।
न चाहिए मुझे हीरे-मोती, मिल जाए तेरे प्यार का शाश्वत सुख ।
रच-बस गया है तू मेरे अंग-अंग के कोने में, मुलाकात चाहूँ सदा के लिए ।
मेरा अंग-अंग डूबा है तेरे कर्ज में, चुकता कर नहीं सकता, प्यार कर लेने दे तू मुझे ।
अनेक बार हुई है कृपा तेरी हमपर, आखरी बार कर दे अपना बनाकर ।
चाहे जैसा भी हूँ जी नहीं सकता तेरे बिना, जी भरकर प्यार कर लेने दे तू मुझे


- डॉ.संतोष सिंह