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Hymn No. 1183 | Date: 26-Jun-1999
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सहना बन चुकी है फितरत इंसानो की, कयामत ढाना स्वभाव है कुदरत तेरा ।
सहना बन चुकी है फितरत इंसानो की, कयामत ढाना स्वभाव है कुदरत तेरा ।
कभी तपता है बनकर आग का गोला, सहते है चुपचाप, कहते हुए-गर्मी है बहुत आज ।
देता है तू गमों का सिलसिला कहकर ये-है कर्मों का फल, भूगत लेते है चुपचाप हम ।
रहबार ये कैसा नियम है तेरा, हाथों में देकर सारी ताकत, फिर भी बनाया है माया का दास ।
मन बहलाने के लिए तू अपना, नांचनचाता है हम कठपुतलियों को ।
जकड़े हुए है कामनाओ में, चारो और घिरे है कर्मो के जाल से ।
नाइंसाफी तुमने तो बहुत की है हमसे, फिर भी दिया है अमोघ हथियार प्रेम का ।
मन में विश्वास का दीप जलाकर सिखता है निपटना संसार की माया से ।
हमको भेजने से पहले आया तू खुद धरा पर, हाथ पकड़केर ले चलने के वास्ते ।
क्या नहीं किया तुमने हमारे वास्ते, मन फिरते दोष लगाया तूझपर कई-कई बार।


- डॉ.संतोष सिंह