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Hymn No. 1195 | Date: 03-Jul-1999
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रास रचता हूँ हर पल, प्रेम में तू हमारे संग ।
रास रचता हूँ हर पल, प्रेम में तू हमारे संग ।
असमंजस में पड़ जाता है, तेरे विपरीत रूप को जानकर ।
कथाओं में कुछ और पढा था, दीदार हुआ परंपराओं से भिन्न ।
फिर भी मजा तो है, इंसानी वेश में आया है प्रभु धरा पर ।
जो जानते न थे, वह कर दिखाया उसके प्यार में ।
सहजता-सरलता में बँधकर जीवन जिया संसार में ।
सीखा दिया उसने सब कुछ, हो सकता है रहकर संसार में ।
गुणवान को मिलता है हर जगह उत्तम स्थान, पर हम दूराचारी को पास बुलाया आपने ।
सर्वश्रेष्ठियो के संग सिखाया हमको भी गाना प्यार का तराना ।
- डॉ.संतोष सिंह
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