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Hymn No. 1201 | Date: 06-Jul-1999
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नारायण-नर बनकर आया धरा पर, प्यार लुटाने के वास्ते ।
नारायण-नर बनकर आया धरा पर, प्यार लुटाने के वास्ते ।
हम सबका मन मोह के, चुंगल से छुड़ाने आया माया के पंजे से ।
आँखों से बरसे प्यार सदा उसके, तरसते हुए रूह को सुकून मिला ।
न जाने कितने जन्मों के प्यासे को अमृतमय प्यार मिला ।
लेना ना कभी उसने सीखा, लुटाता रहा अपनो पर प्यार सदा ।
उसकी इस अदा पर दिल फिदा हो गया, जीते जी जन्नत पा गया ।
सहजता से बदल डाला प्यार के घोल में घोलकर हमको ।
हाथों की लकीर बदल डाली, प्यार के साँचे में ढाल के ।
सुन लो इस बावरे की बात लोगों, न जाना रघुबर को ढूँढने कहीं और ।
आँख बंद करके झाँक लो, अपने दिल में, मिल जाएगा इंतजार करता वहाँ ।


- डॉ.संतोष सिंह