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Hymn No. 1202 | Date: 07-Jul-1999
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गुंज है चारों और ૐ की, सुनकर बेकरार हो उठा दिल मेरा ।
गुंज है चारों और ૐ की, सुनकर बेकरार हो उठा दिल मेरा ।

मन हो उठा बेचैन, ये गूँजे कहाँ से गूँजे, भीतर से की बाहर से ।

नजर दौडाई चारों ओर, नजर नहीं आया मेरे सिवाय कोई ओर ।

बंद आँखें करके ध्यान जब खुद पर किया, तो जाना गूँजे हो रही थी हवा की सरसराहटों से ।

फड़फड़ाटे उठा दिल भीतर ही भीतर, सुनकर आनंद से भरे गीतों को ।

दिल की झनझनाहट ने जगाया सोए हुए प्यार को, परम प्यार को पाने के वास्ते ।

खोई हुई स्मृतियाँ ताजा हो उठी, कल की बातें धीरे-धीरे याद आने पर ।

सपने जो अधूरे थे, उसे पूरा करने के लिए, दृढ़ हो गया खोया प्यार पाकर ।

रोम-रोम भर गया उमंगों से, जब पाया परम को परम निहारते हुए ।

मैं तो भूला था माया में, पर उसने पलकें बिछाए रखी थी सदियों से ।


- डॉ.संतोष सिंह