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Hymn No. 1203 | Date: 08-Jul-1999
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गुनगुना हो उठा रोम-रोम मेरा, नाम लेते ही तेरा ।
गुनगुना हो उठा रोम-रोम मेरा, नाम लेते ही तेरा ।
झूम उठा दिल मेरा मयुर के भाँति, जो दीदार हुआ तेरा ।
पाखी के भाँति उड़ चला मन नभ में, तेरे प्यार को याद करके ।
दीवानगी का ज्वार उठा भीतर से, जो तुमने पुकारा मुझे ।
बरबस रो पड़ा, इस ठुकराए हुए को, जो शरण मिली चरणों में तेरे ।
मुरझाए हुए दिल पर पड़ा जो प्रेम का छींटा, छिड़ उठा तराना प्यार का ।
नजर मिली जो इक बार को तुझसे, सुरूर छाया मस्ती का ।
होश ना रहा हमें कुछ का, मदहोशी छाई हमपर तेरे प्यार की ।
आगोश में जो तेरे समाया, बन गई जीते-जी प्यार की दंतकथा ।
ना कहने को कुछ है बाकी, जो प्यार में प्यार ही प्यार मिलता गया ।


- डॉ.संतोष सिंह