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Hymn No. 1204 | Date: 09-Jul-1999
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कमल को देखा तो याद आई गुरु की, कैसे पाई तुमने समरूपता इतनी ।
कमल को देखा तो याद आई गुरु की, कैसे पाई तुमने समरूपता इतनी ।
संसार रूपी कीचड़ में रहकर, रहते दोनों निर्लिप्त मस्ती में झुमते सदा ।
भेद करना होता है मुश्किल गुरु और कमल में, कैसे तू रच-बस गया गुरु में मेरे
वास कैसे पाया गुरु के अंग-अंग में तुमने छोड़ा क्यों नहीं तुमने कोई स्थान ।
कर कमल हो या हस्तकमल, नाभीकमल हो या हृदयकमल ।
मुखकमल हो या नेत्रकमल, और तो और गुरु के सिर पर चढ़ा सहस्त्रदल कमल बनकर ।
जहाँ तक नजर दौडाई, वहा पर कमल को पाया, कमल तुमने कैसे किया कमालये
मेरी बात सुनके कमल मुस्करातेया, धीरे से पास आके फुसफुसाया ।
कमल बनने के लिए अमल करना पड़ता है गुरु की हर बात पर ।
दिन बदलते देर नहीं लगता जब होने लगती है प्रेम की बरसात गुरु कृपा से ।


- डॉ.संतोष सिंह