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Hymn No. 118 | Date: 27-Dec-1997
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हर वक्त लडते रहते है हम इस जहान में एक दूसरे से ।
हर वक्त लडते रहते है हम इस जहान में एक दूसरे से ।
कोई ना मिला तो खुद से खुद ही लड़ते रहते है ।
सडते है न जाने कब से इस तन के बंधन में, तोड़ना चाहते ही नहीं ।
जीवन के हर मोड पे राह मिलती है जाने को तेरी ओर, जाते ही नहीं ।
क्या चाहते है हम, इस जीवन में अब तक उससे वाकिफ हो न पाया ।
पाने और पाने के चक्कर में पाना सीख पायें नहीं, सब कुछ खोते जाते है ।
सोते से जगाने वाला सद्गुरू हमारा हर बार आता है लौटा ले चलने के लिये।
हाथ पकडते है उसका, दूसरे हाथ से जगत का छोर थामे रखते है ।
मौका जब गँवाते है अहसास दिल को तब होता है अबूझ संसार का ।
देर आये, दुरूस्त आये पलकें बिछाके कें स्वागत करता है वो सदा ।
- डॉ.संतोष सिंह
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