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Hymn No. 119 | Date: 05-Jan-1998
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घूँट – घूँट में जो करे निवास, हर पल रहता है संग हमारे ;
घूँट – घूँट में जो करे निवास, हर पल रहता है संग हमारे ;
वहीं तो है गुरूओं का गुरू, हम सब का परम् सद्गुरू काकाश्री ।
जैसे सूरज के बिन है सुरजमुखी का जीवन अधुरा ;
वैसें ही तेरे बिन् मृत पड़े है हम चमड़े के इस पिंजरे में ।
सब कुछ तुझमें ही देखते है सबमें तुझको ही खोजते है;
हर काल में तूने नाम बदला – बदला चोला; पर भक्तों ने तुझको खोज लिया।
पुष्प हार से तू न मानें, दीया बाती पे तू जा रीझे,
प्रेम का हार सबसे बढ़िया, जिसने किया अर्पण तुझको उसपे तू रीझे ।
तन की सीमाओं से है परे तू, मन की ठोर से है बंधा तू ;
हर इक् तन में तू विराजे, तूझे ही परम् प्रभु परमेश्वर है कहते ।
- डॉ.संतोष सिंह
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