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Hymn No. 1207 | Date: 12-Jul-1999
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जन्मा परम अवतारी धरा पर, हम सबके बीच कई-कई बार ।
जन्मा परम अवतारी धरा पर, हम सबके बीच कई-कई बार ।
भ्रम के चलते मन को विश्वास न आया एक बार ।
सहजता से बदल दिया, अगूढ़, कार्यों को सरलता में ।
मन पर जो छाप पड़ी थी जन्मों-जन्म की, नाम दे दिया उसे संयोगों का ।
बिछुडने-मिलने का खेल-खेला हमने, अपने दोषों के चलते ।
हर बार आए वह समझाने-बुझाने, मन में प्रेम का दीप जलाने ।
सिला दिया गमों का उसे, पर हार न मानी एक बार उसने ।
ख्वाबों में आकर गाए अमृतमय गीत, दिल भी रीझ गया प्यार देखकर उसका ।
औकात कुछ ना थी हमारी सामने उसके, कृत-कृत हुआ तन-मन मेरा ।
अब की बार कर दी चलने की तैयारी हमने, रंग में रँगकर उसके ।


- डॉ.संतोष सिंह