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Hymn No. 1208 | Date: 10-Jul-1999
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ओ.. काशी के भोलेनाथ, अयोध्या के रधुनाथ ।
ओ.. काशी के भोलेनाथ, अयोध्या के रधुनाथ ।
द्वारका के रणछोड बनकर आया तू, मुंबई में काका हमारा ।
रहकर दुनिया में धुनी जमाई तुमने शिवशंकर-सी ।
मर्यादा का पाठ पढाया, संसार के दायित्वों को निभाते हुए ।
प्रेम का रास रचाया हम जैसे जन्मों-जन्म के अतृप्तों के वास्ते ।
बरदाश्त किया उल्टी-सीधी हमारी हर अबोध हरकतों को ।
हर युग में तुमने मुक्त कराया धरा को दुष्टों से ।
इस युग में बदल दिया मुझ जैसे दुष्ट को अपना अमूल्य प्यार देकर ।
बावरा हो गया हूँ, पहनकर नाचना चाहूँ पैरों में घुंघरू तेरे सम्मुख ।
सारी मर्यादाओं को तोडकर ढल जाऊँ मस्ती में तेरा प्रेम गीत बनकर ।


- डॉ.संतोष सिंह