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Hymn No. 1232 | Date: 24-Jul-1999
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कैसे कहूँ प्रभु तू ना है, तू नहीं, तो होकर भी कोई नहीं ।
कैसे कहूँ प्रभु तू ना है, तू नहीं, तो होकर भी कोई नहीं ।
इस जग के हर इक कण पर स्पष्ट छाप नजर आती है तेरी ।
गगन जो याद दिलाए तेरी, न जाने कितने जहाँ समाए है उस में ।
हवा की सरसराहटों से गूँजता है नाम तेरा, हर पल धीमे-धीमे ।
आग है तेरा रूप, जो करती है सबको खाक, तेरा रूप देने के वास्ते ।
जल पर मिलती है तेरी छाप, निर्जीवों को जीव में ढाले, अमृत पान कराके ।
मिट्टी से बनता है सब कुछ, मिटता भी है इसी में, नहीं अलग तुझसे कुछ ।
क्यों जाऊँ किसी मंदिर-मस्जिद में, जब दीदार हो दिल को तेरा हर पल ।
ऐसा कुछ ना मिला मुझे, जो तेरी सत्ता से हो अलग-थलग ।
विशेष की चाहत नहीं, दर-दर पर तेरा दर्शन करते मस्ती में ।


- डॉ.संतोष सिंह