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Hymn No. 1233 | Date: 25-Jul-1999
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ना चाहिए तुझसे कोई और सबूत, कहता है ये कपूत ।
ना चाहिए तुझसे कोई और सबूत, कहता है ये कपूत ।
कराया है तुमने कितनी बार, अपने होने का एहसास ।
मन के चलते भ्रम में जीते, रोते हुए जीवन बिताते ।

यथार्थ को जानकर, ढाल नहीं पाते अनुरूप उसके ।
जब करने को जाते है, तब कर देते है देर बहुत।
कमी तो खुद में है, दोष देते है दूसरों को ।
सिलसिला कब तक ये चलता रहेगा, अजिय्यत आ गया हूँ इससे ।
रहते है अज्ञानी, जो ना होता है हाथों में, उसके वास्ते कराता है करम ।
करा ले जो तू चाहे, वे करम हमसे ।
मैंने ना निभाया है अपना पूरा धर्म, सीखा दे तू हमको ।


- डॉ.संतोष सिंह