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Hymn No. 1245 | Date: 06-Aug-1999
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टूटा हुआ था मैं, भटकता था इस जग में तेरे वास्ते ।
टूटा हुआ था मैं, भटकता था इस जग में तेरे वास्ते ।
बँधे थे जो रास्ते, खुल गए, मुलाकात होते ही तुझसे ।
जो जीवन के राह भरे पड़े थे काटों से, निगाह पड़ते फूल खिल गए।
सोचा-समझना काम न आया, तेरे प्यार के सिवाय कुछ हाथ न आया ।
जब-जब फँसा था कर्मों के घेरे में, उबारा तुमने कृपा बरसाकर हमपर ।
जो दिया तो पाया था तुझसे, प्यार किया, वह भी सीखा था तुझसे ।
सलामती की कोई आरजू नहीं, खो जाना चाहते है प्यार बनकर तेरा ।
यार कब तक चलेगा खेल तेरा, मिलने और बिछुडने का ।
बहुत हो गया मिटाए ना मिटती है तरस घूँट दो घूँट प्यार के जाम से ।
अब तो चाहत है, हो जाए किस्सा तमाम तेरे प्यार में डूबकर ।
- डॉ.संतोष सिंह
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