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Hymn No. 1249 | Date: 09-Aug-1999
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प्रभु तू ही मेरा धर्म है, तू ही मेरा कर्म है ।
प्रभु तू ही मेरा धर्म है, तू ही मेरा कर्म है ।
तू ही मेरा दिल है, दिल से उठी हुई हर तरंग है ।
जन्म हो या मृत्यु, मेरी मंजिल की शुरुआत और अंत है ।
स्वर्ग में रहूँ या नरक में, कही से तुझसे अलग नहीं मैं ।
समाया है संसार सारा, तुझमें और तू मुझमें, मैं संसार में ।
आधिन है सब कुछ तेरे, तू नहीं किसी और के ।
निश्चित तौर पर कहना है मुश्किल, प्रेम में माफ है सब कुछ ।
अधिकारी नहीं, अधिकार मिला है, तो प्रिय की अनुकंपा से ।
संबंध है मेरा तुझसे, कई जन्मों पुराना, करबद्ध हूँ चरणों में तेरे ।
आवाज है ये दिल की, दौड़ रही है मन के संग तेरी ओर ।


- डॉ.संतोष सिंह