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Hymn No. 1255 | Date: 14-Aug-1999
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लूट मची है चारों और सारे जहाँ में, हर कोई, हर एक को लूट रहा है ।
लूट मची है चारों और सारे जहाँ में, हर कोई, हर एक को लूट रहा है ।
पशु हो या पक्षी, फूल हो या पत्ते, मानव-अमानव हर कोई एक दूजे को लूट रहा है ।
किसी का हक है, कोई बेहक, थोडा या ज्यादा, संकोच-निःसंकोच लूट रहे है सब ।
फुलो को लूटते देखा, पेड़ और पौधों को, इंसानों ने लूटा सबको बेहिचक ।
अरे.. प्रभु तुझको भी ना छोड़ा हमने, सरेआम लूटा एक बार नहीं कई-कई बार ।
कई बार प्यार से लूटा, और तो और कई बार लूटा तेरे नाम पर दूजों को ।
लूटने में तू भी कम नहीं, लूटा है हमारे पापों को, मन की कुप्रकृतियों को ।
भेद होगा लूटने के तौर-तरीको में, भाव होगा अच्छे-बुरे का, पर लुटते पाया सबको ।
समझ न पाया लुटते-लुटाते, खुद को पाया तेरे जहाँ में ।


- डॉ.संतोष सिंह