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Hymn No. 1266 | Date: 28-Aug-1999
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रह-रहकर ये क्या हो जाता है दिल को, जो उतर जाता है मनमानी पर ।
रह-रहकर ये क्या हो जाता है दिल को, जो उतर जाता है मनमानी पर ।
चलते है प्यार की डगर पर, क्यों पहूँच जाते है, काम के संसार में ।
पीछे है कर्मो का अथाह बोझ, दिल में है अमृत भरे तेरे बोल ।
फिर भी फिर जाता है मन, मृतवत संसार की लालसाओं में ।
समझा नहीं था ये अधुरा प्यार है, या पिछले जन्मों का हिसाब ।
सँभलती दशा बिगड़ जाती है, जरा सा कदमों के लड़खड़ाते ही ।
काबू में है हम तेरे, हम हालात के काबू में नहीं ।
कमजोर को जोर दे अपना, निडर होकर निकल मन की गलियों से ।
तूफाँ से डरता नहीं, हिम्मत है अथाह सागर को चिरकर रख देने की ।
फिर मन के आगे क्यों हो जाता हूँ बेबस, बना दे तू मुझे सबल ।


- डॉ.संतोष सिंह