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Hymn No. 1267 | Date: 28-Aug-1999
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जब-जब न माना तेरा कहना, हाथ मलता रह गया ।
जब-जब न माना तेरा कहना, हाथ मलता रह गया ।
तुमने कहा हुआ न जाना, गीत गा-गाकर हर बार तुमने समझाया ।
समझ-समझकर कैसे चले गए हम नासमझी की ओर ।
दौर पर दौर गुजरते गए, हाथ में आया हुआ सरकने लगा ।
ऐसा कैसे हुआ ऐ प्रिय, तेरे रहते मैं क्यों दूर हुआ ।
कब कहाँ,कौन सी चुक की मैंने कि घिर गया मजबूरीयों से ।
ख्वाबों में तो तू था, तो कैसे हो गया वश में माया के ।
डर जाता हूँ ऐसे अनहोनीयो से, जो हतप्रभ कर जाती है मुझे ।
आया हूँ जहाँ मैं तेरे वास्ते, न जाने देना तू मुझे कोई और रास्ते ।
ना चाहिए कुछ और मुझे, रच-बस जाने दे प्यार में तेरे ।


- डॉ.संतोष सिंह