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Hymn No. 1292 | Date: 18-Sep-1999
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ताल के बिन सुना है सारा संसार, जहाँ जाऊँ वहाँ सुनता हूँ तेरी ताल ।
ताल के बिन सुना है सारा संसार, जहाँ जाऊँ वहाँ सुनता हूँ तेरी ताल ।
नभ में बादलों का ढोल बजाता तू, सुर को बेसुरा करके सुर में ढाल देता तू ।
ऊपर-नीचे हो चाहे कहीं ओर सुर की उठा-पटक पवन के संग करता है तू ।
सागर का किनारा हो मौजे भी थिरकती है, प्रभु तेरे इशारे पर जाते हुए ।
झूमता है तेरे ताल पर और खलिहान छेड़ते हुए मधुर राग ।
पक्षियों की चहचहाहट हो या पशुओं के स्वर, सभी तो होते है तेरे राग दरबारी ।
पाताल में भी गूँजते पाया लावा को, हडकंप मचाकर अनहद नाद के स्वरों में गाते पाया ।
मिटना हो या जन्मना, जीवन के हर पल को तुमने पिरोया है गीत-संगीत में ।
समझने की चाहत-ताकत नहीं हममें, रम जाने का आशीर्वाद दे दे तू हमें ।
गूँजा करेगें अनंत में तेरे दिल की तरंग बनकर नये-नये सुर-संगीत में ।


- डॉ.संतोष सिंह