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Hymn No. 1320 | Date: 09-Oct-1999
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करुँ मैं तेरा श्रृंगार अपने हाथो, पल भर को ओझल ना होने दुँ निगाहों से ।
करुँ मैं तेरा श्रृंगार अपने हाथो, पल भर को ओझल ना होने दुँ निगाहों से ।
मेरी पूजा- प्रार्थना होगी यही, किसी कोने में लगाकर आसन ना बैठना मुझे ।
बोलने का कष्ट ना करना पड़े तुझे, नजरों ही नजरों में समझे हम हर बात तेरी।
चरणों में बैठ निहारता रहूं तुझको, तेरे सिवाय किसी और की ख्यालो में ना आने दूं ।
कोई और बात मन को न आएगी रास, दिन हो या रात हाजिर रहूं सेवा में तेरी
मेवा की कोई चाहता नहीं, चाहत है तो तेरा करीब बने रहने में ।
भाँती-भाँती के स्वांग रचाऊँ, तेरा मन बहलाने के खातिर नये-नये करतब दीखाऊँ कुछ भी करना पर दूर ना रखना मुझको अपने से, चाहे सहना पड़े दर्द कितना भी ।
निकले है सेवा के रास्ते पर, आहों के शूल चुभेंगे हजारो स्वीकार करेंगे प्यार से उसे ।
कोई डर दिल में ना आने देंगे प्यारे, हम तो तेरे प्यार में जो खोए रहेंगे ।


- डॉ.संतोष सिंह