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Hymn No. 1335 | Date: 12-Oct-1999
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जश्न मना रहा हूँ मस्ती का, किस वजह से कुछ पता नही ।
जश्न मना रहा हूँ मस्ती का, किस वजह से कुछ पता नही ।
छाया रहता है सुरूर नशे का, लब ने छुआ नही जाम को कभी ।
हँसी आती है अपने आप पर, हालात कैसे बदल गए अपने इतने ।
आनंद में डूबा है रोम-रोम मेरा, आनंद को ढूँढना नहीं पड़ता अब ।
प्यार का सैलाब उमड़ता है भीतर से, प्यार किसी का ना चाहिए मुझे ।
समझ नहीं आता है, समझने की चाहत जो मिट गई मेरी ।
दुश्वारियों में भी हँसना सीख गया, मौज में भी जो रहने लगा ।
कहना भी नहीं चाहता कुछ तुझसे, दिल ही दिल में कहना जान गया ।
घंटों बीत जाते है यादों में तेरे, पल भर का एहसास नही होता ।
मतलब ना रहा किसीसे, बेमतलब में भी खुशी आने लगी ।


- डॉ.संतोष सिंह